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घोटाले के आरोपी डॉ. शर्मा का अग्रिम जमानत आवेदन खारिज, लेकिन निलंबन और गिरफ्तारी पर चुप्पी क्यों?

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देवास के सीएमएचओ कार्यालय में 4.26 करोड़ से ज्यादा के घोटाले के आरोपी डॉ. एमपी शर्मा का अग्रिम जमानत आवेदन सोमवार को देवास जिला न्यायालय ने खारिज कर दिया। यह घटना एक बड़े भ्रष्टाचार कांड का हिस्सा है, जिसमें दो सीएमएचओ और एक तत्कालीन जिला टीकाकरण अधिकारी भी शामिल हैं। एफआईआर दर्ज होने के बावजूद डॉ. शर्मा अभी तक न तो निलंबित हुए हैं और न ही गिरफ्तार किए गए हैं।

न्याय प्रणाली की सख्ती

न्यायालय ने शासकीय अधिवक्ता अशोक चावला के तर्कों से संतुष्ट होकर अग्रिम जमानत आवेदन खारिज कर दिया, जो कि एक सकारात्मक कदम है। चावला ने कहा कि यदि डॉ. शर्मा को अग्रिम जमानत मिलती है, तो वे अपने पद का दुरुपयोग कर जांच को प्रभावित कर सकते हैं। यह तर्क सही साबित हुआ और न्यायालय ने इस पर सहमति जताई।

प्रशासन की उदासीनता

एफआईआर दर्ज होने के बावजूद, डॉ. शर्मा न तो निलंबित हुए हैं और न ही गिरफ्तार किए गए हैं। यह प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक सरकारी कर्मचारी के खिलाफ प्रकरण दर्ज होने पर तुरंत निलंबन की प्रक्रिया अपनाई जाती है, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। डॉ. शर्मा का फरार रहना और पुलिस का उन्हें गिरफ्तार न करना उनकी रसूख और राजनीतिक पहुंच को दर्शाता है।

राजनीतिक पहुंच का असर

माना जा रहा है कि डॉ. शर्मा का एक रिश्तेदार आईएएस ऑफिसर है, जिसकी वजह से प्रशासन ने जांच रिपोर्ट को महीनों तक दबा कर रखा। यह दर्शाता है कि कैसे राजनीतिक पहुंच का दुरुपयोग करके भ्रष्टाचारियों को बचाया जाता है। मीडिया के दबाव के बाद ही एफआईआर दर्ज की गई, जो कि एक शर्मनाक स्थिति है।

प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल

अब देखने वाली बात यह होगी कि पुलिस कितनी निष्पक्षता से काम करती है और मामले को न्यायालय तक ले जाती है। डॉ. शर्मा का फरार रहना और पुलिस का अब तक उन्हें गिरफ्तार न करना, प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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