
देवास में मंत्री पद की दौड़: कोई समीकरण जोड़ने में जुटा, तो कोई दावेदारी तोड़ने में? पांच विधायक देने वाला जिला अब भी सत्ता में खाली हाथ
देवास लाइव राजनीतिक संपादकीय
मध्यप्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार की सुगबुगाहट के साथ देवास जिले की राजनीति में अचानक हलचल बढ़ गई है। देवास विधायक गायत्री राजे पवार ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात की। खातेगांव विधायक आशीष शर्मा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ दिखाई दिए, जबकि सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी की तस्वीर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ सामने आई।
इन मुलाकातों को सामान्य शिष्टाचार बताया जा सकता है, लेकिन जब मंत्रिमंडल में चार नए चेहरों को जगह मिलने की चर्चा चल रही हो, तब ऐसी तस्वीरों के राजनीतिक अर्थ निकलना स्वाभाविक है। सवाल यह है कि क्या देवास जिले को इस बार मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिलेगा? यदि मिलेगा तो पांच भाजपा विधायकों में किसका नंबर लगेगा?
फिलहाल मंत्री पद की दौड़ में सबसे अधिक सक्रिय देवास विधायक गायत्री राजे पवार और खातेगांव विधायक आशीष शर्मा दिखाई दे रहे हैं। लेकिन देवास भाजपा के अंदरूनी समीकरण इतने सरल नहीं हैं। यहां कोई अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए संबंध जोड़ने में लगा है, तो कोई राजनीतिक शक्ति-संतुलन के जरिए दूसरे की दावेदारी कमजोर कर सकता है।
भाजपा को पांचों सीटें, फिर भी देवास खाली हाथ
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में देवास जिले की देवास, सोनकच्छ, हाटपीपल्या, खातेगांव और बागली—पांचों सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की। इसके बावजूद डॉ. मोहन यादव के मंत्रिमंडल में जिले के किसी विधायक को स्थान नहीं मिला।
राजनीतिक दृष्टि से यह स्थिति असामान्य मानी जा सकती है। जिस जिले ने भाजपा को शत-प्रतिशत चुनावी सफलता दी, उस जिले को सरकार में प्रतिनिधित्व नहीं मिला। अब मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा के बीच पांचों विधायकों के चुनावी और राजनीतिक दावों का आकलन जरूरी है।
गायत्री राजे पवार: तीसरी बार विधायक, लेकिन राह में अंदरूनी समीकरण
गायत्री राजे पवार वर्ष 2015 के उपचुनाव, 2018 और 2023 का चुनाव जीतकर तीसरी बार देवास की विधायक बनी हैं। वर्ष 2023 में उन्हें 1,17,422 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस के प्रदीप चौधरी को 26,956 मतों से हराया। यह जिले के प्रमुख चुनावी जनादेशों में से एक था।
उनके पक्ष में लगातार तीन जीत, लंबा राजनीतिक अनुभव और पवार परिवार की परंपरागत पकड़ है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में देवास विधायक को सत्ता और प्रशासन में प्रभावशाली माना जाता था। अब गायत्री राजे पवार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश करती दिखाई दे रही हैं।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से ज्यादा भाजपा के अंदर है। सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी और गायत्री राजे पवार के बीच राजनीतिक दूरी देवास में किसी से छिपी नहीं मानी जाती। दोनों भाजपा में रहते हुए भी अलग-अलग शक्ति केंद्र के रूप में देखे जाते हैं। यदि गायत्री राजे का नाम मंत्री पद के लिए आगे बढ़ता है, तो क्या जिले का पूरा भाजपा नेतृत्व उनके साथ खड़ा होगा? यही सबसे बड़ा सवाल है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि विधायक अपनी दावेदारी जोड़ने के लिए मुख्यमंत्री तक पहुंच रही हैं और दूसरी ओर उनके विरोधी राजनीतिक समीकरण उसे तोड़ने में लगे हैं?
आशीष शर्मा: लगातार तीसरी जीत और दिल्ली तक पहुंच
खातेगांव विधानसभा क्षेत्र से आशीष गोविंद शर्मा लगातार तीसरी बार विधायक हैं। उन्होंने 2013, 2018 और 2023 में जीत दर्ज की। वर्ष 2023 में उन्हें 98,629 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस के दीपक जोशी को 12,542 मतों से पराजित किया।
तीन बार का अनुभव उनकी दावेदारी को मजबूत बनाता है। वे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी माने जाते हैं और खातेगांव क्षेत्र विदिशा लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है, जहां से शिवराज सिंह चौहान सांसद हैं। हालांकि यही नजदीकी वर्तमान मुख्यमंत्री के राजनीतिक समीकरण में उनके लिए चुनौती भी बन सकती है।
आशीष शर्मा की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात को इसीलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह मुलाकात बताती है कि वे अपनी दावेदारी केवल क्षेत्रीय अथवा शिवराज खेमे तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व तक अपनी पहुंच दिखाना चाहते हैं।
फिलहाल देवास जिले में मंत्री पद के लिए आशीष शर्मा सबसे सक्रिय दावेदारों में शामिल दिखाई दे रहे हैं। लेकिन अंतिम निर्णय उनके अनुभव से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगा कि मुख्यमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व उन्हें किस राजनीतिक खेमे के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं।
डॉ. राजेश सोनकर: चर्चा से दूर, लेकिन चौंकाने वाला नाम बन सकते हैं
सोनकच्छ से भाजपा विधायक डॉ. राजेश सोनकर ने 2023 के चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा को हराया था। उन्हें 1,08,869 वोट मिले और जीत का अंतर 25,437 मत रहा।
राजेश सोनकर इससे पहले 2013 में सांवेर से विधायक रह चुके हैं। यानी वे दूसरी बार के विधायक होने के साथ संगठन का अनुभव रखने वाले नेता हैं। सोनकच्छ अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। ऐसे में यदि मंत्रिमंडल विस्तार में अनुसूचित जाति, संगठनात्मक अनुभव और क्षेत्रीय संतुलन को आधार बनाया गया, तो राजेश सोनकर चौंकाने वाला नाम हो सकते हैं।
वे अभी गायत्री राजे पवार और आशीष शर्मा की तरह मंत्री पद की खुली दौड़ में दिखाई नहीं दे रहे हैं, लेकिन भाजपा में कई बार सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला नहीं, बल्कि संगठन की पसंद वाला चेहरा अंतिम समय में आगे निकल जाता है।
मनोज चौधरी: तीन चुनावी जीत और सिंधिया खेमे का सहारा
हाटपीपल्या से विधायक मनोज नारायण सिंह चौधरी ने 2023 में 89,842 वोट प्राप्त किए। उन्होंने कांग्रेस के राजवीर सिंह बघेल को 4,142 मतों के करीबी अंतर से हराया।
मनोज चौधरी पहली बार 2018 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। वर्ष 2020 के राजनीतिक घटनाक्रम में उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा। इसके बाद उन्होंने 2020 का उपचुनाव और 2023 का विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर जीता। इस तरह वे लगातार तीन चुनावी जीत दर्ज कर चुके हैं।
उनके पक्ष में सबसे बड़ा राजनीतिक आधार केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का समर्थन हो सकता है। वर्ष 2020 में कांग्रेस सरकार गिराने वाले विधायकों को भाजपा ने समय-समय पर राजनीतिक महत्व दिया है। यदि मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया समर्थकों को फिर प्रतिनिधित्व मिलता है, तो मनोज चौधरी भी दावा प्रस्तुत कर सकते हैं।
हालांकि वर्ष 2023 में उनकी जीत का अंतर जिले के अन्य भाजपा विधायकों की तुलना में काफी कम रहा। फिलहाल वे मंत्री पद की दौड़ में उतने सक्रिय दिखाई नहीं दे रहे हैं, लेकिन खेमों की राजनीति में उनका नाम पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
मुरली भंवरा: पहली बार विधायक, आदिवासी प्रतिनिधित्व सबसे बड़ी ताकत
बागली की अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट से मुरली भंवरा पहली बार विधायक बने हैं। वर्ष 2023 में उन्हें 1,05,320 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस के गोपाल भोसले को 7,779 मतों से हराया।
मुरली भंवरा राजनीति में आने से पहले निजी विद्यालय में शिक्षक रहे हैं। उन्हें संगठन और संघ की पृष्ठभूमि वाला जमीनी चेहरा माना जाता है। पहली बार विधायक होना उनकी दावेदारी को सीमित करता है, लेकिन आदिवासी प्रतिनिधित्व उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है।
यदि भाजपा नेतृत्व नए, अपेक्षाकृत विवादरहित और आदिवासी चेहरे को आगे बढ़ाना चाहे, तो मुरली भंवरा को अवसर मिल सकता है। हालांकि फिलहाल वे मंत्री पद के लिए सक्रिय लॉबिंग करते दिखाई नहीं दे रहे हैं।
शिवराज से नजदीकी—ताकत या बाधा?
गायत्री राजे पवार और आशीष शर्मा दोनों पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी माने जाते हैं। शिवराज सरकार के दौरान देवास विधायक की प्रशासनिक और राजनीतिक ताकत स्पष्ट दिखाई देती थी। लेकिन अब प्रदेश की सत्ता का केंद्र बदल चुका है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वाभाविक रूप से अपना राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा तैयार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या वे शिवराज खेमे से जुड़े माने जाने वाले दोनों नेताओं में से किसी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करेंगे? या फिर देवास जिले से किसी ऐसे तीसरे चेहरे को आगे बढ़ाया जाएगा, जो वर्तमान सत्ता और संगठन के लिए अधिक सहज हो?
यहीं डॉ. राजेश सोनकर, मनोज चौधरी अथवा मुरली भंवरा जैसे नाम अप्रत्याशित रूप से सामने आ सकते हैं।
पांचों विधायकों की स्थिति एक नजर में
| विधानसभा | भाजपा विधायक | 2023 में मिले वोट | जीत का अंतर | राजनीतिक स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| देवास | गायत्री राजे पवार | 1,17,422 | 26,956 | तीसरी बार विधायक, सक्रिय दावेदार |
| सोनकच्छ | डॉ. राजेश सोनकर | 1,08,869 | 25,437 | दूसरी बार विधायक, संगठन और आरक्षित वर्ग का समीकरण |
| हाटपीपल्या | मनोज चौधरी | 89,842 | 4,142 | तीन चुनावी जीत, सिंधिया समर्थक |
| खातेगांव | आशीष गोविंद शर्मा | 98,629 | 12,542 | लगातार तीसरी बार विधायक, सक्रिय दावेदार |
| बागली | मुरली भंवरा | 1,05,320 | 7,779 | पहली बार विधायक, आदिवासी चेहरा |
मंत्री बन भी गए, तो क्या जिले का भला होगा?
मंत्री कौन बनेगा, यह भाजपा के अंदरूनी समीकरण तय करेंगे। लेकिन जनता का प्रश्न इससे अलग है। देवास जिले ने भाजपा को पांचों विधानसभा सीटें दीं और लोकसभा चुनाव में भी भारी समर्थन दिया। इसके बदले जिले को कौन-सी बड़ी योजना मिली?
देवास शहर में अधूरी सड़कें, जलभराव, अव्यवस्थित विकास और अटकी परियोजनाएं हैं। हाटपीपल्या और सोनकच्छ के किसान अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं। खातेगांव-कन्नौद क्षेत्र में रेल, सिंचाई, स्वास्थ्य और भूमि अधिग्रहण से जुड़े सवाल हैं। बागली के आदिवासी अंचल में सड़क, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग वर्षों से बनी हुई है।
इसके बावजूद जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक मुलाकातें विकास कार्यों की तुलना में ज्यादा तेजी से प्रचारित होती हैं। बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें तो लगातार सामने आती हैं, लेकिन जिले के लिए बड़ी परियोजना, विशेष बजट और समयबद्ध क्रियान्वयन दिखाई नहीं देता।
यदि वर्षों तक आपसी खींचतान, गुटबाजी और बिना दूरगामी सोच के विकास किया जाएगा, तो परिणाम भी वैसा ही मिलेगा—“बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होए?”
फिलहाल देवास जिले में कोई मंत्री पद के लिए समीकरण जोड़ रहा है, तो कोई दूसरे की दावेदारी काटने की स्थिति में है। इस पूरी दौड़ के बीच जनता केवल इतना पूछ रही है—कुर्सी मिल भी गई, तो क्या देवास जिले का विकास कर पाएंगे या फिर एक और तस्वीर वायरल करके कहानी खत्म हो जाएगी?

