देवास में आठों एल्डरमैन OBC? भाजपा की नियुक्तियों पर उठा सवर्ण और SC-ST की अनदेखी का सवाल

सोशल मीडिया पर नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल, राजनीतिक संतुलन के बीच सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर छिड़ी नई बहस
आठ नियुक्तियों के बाद सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस, दावा—सभी नाम OBC वर्ग से; भाजपा के सामाजिक संतुलन पर उठ रहे सवाल
देवास। नगर निगम देवास में लंबे इंतजार के बाद हुई आठ एल्डरमैन (मनोनीत पार्षद) की नियुक्तियों को लेकर अब एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा होता दिखाई दे रहा है। नियुक्तियों के सियासी समीकरण और नेताओं की पसंद के बाद अब इन नियुक्तियों में सामाजिक और जातिगत प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में दावा किया जा रहा है कि नियुक्त किए गए सभी आठ एल्डरमैन अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC से आते हैं। इसी दावे के आधार पर अब सवाल उठ रहा है कि क्या नियुक्तियों में सवर्ण वर्ग के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया?
नगर निगम देवास में हाल ही में राजेश यादव, अर्जुन चौधरी, हरीश देवलिया, प्रिया शर्मा, सचिन सोनी, संतोष वर्मा, दिनेश सांखला और चेतन योगी को एल्डरमैन बनाए जाने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में रही है। नियुक्तियों को लेकर पहले से ही अलग-अलग भाजपा नेताओं के राजनीतिक खेमों का समीकरण चर्चा में है। सोशल मीडिया पर प्रकाशित एक राजनीतिक विश्लेषण में भी नियुक्तियों को विधायक, सांसद, नगर निगम सभापति और भाजपा संगठन से जुड़े अलग-अलग राजनीतिक खेमों से जोड़कर देखा गया है।
अब मामले में जातिगत प्रतिनिधित्व का मुद्दा जुड़ने के बाद बहस और तेज हो सकती है। फेसबुक सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कुछ भाजपा नेता और कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि यदि सभी आठ नियुक्तियां वास्तव में एक ही सामाजिक वर्ग OBC से की गई हैं, तो फिर सामान्य यानी सवर्ण वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज से किसी व्यक्ति को मौका क्यों नहीं दिया गया?
राजनीतिक संतुलन साधा, लेकिन क्या सामाजिक संतुलन छूट गया?
एल्डरमैन नियुक्तियों को अब तक भाजपा के अंदरूनी राजनीतिक संतुलन के नजरिए से देखा जा रहा था। चर्चाओं के अनुसार विधायक गायत्री राजे पवार के समर्थक माने जाने वाले नेताओं को सबसे ज्यादा स्थान मिला, जबकि सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी, नगर निगम सभापति रवि जैन और भाजपा जिलाध्यक्ष के खेमे से जुड़े नामों को भी प्रतिनिधित्व मिलने की बात सामने आई।
इस तरह भाजपा ने अपने प्रमुख स्थानीय राजनीतिक खेमों के बीच संतुलन साधने की कोशिश तो की, लेकिन अब उठ रहे सवाल यह हैं कि क्या राजनीतिक संतुलन बनाने के फेर में सामाजिक संतुलन की अनदेखी हो गई?
प्रदेश में एल्डरमैन नियुक्तियों को भाजपा के जमीनी और लंबे समय से अवसर की प्रतीक्षा कर रहे कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने की रणनीति के रूप में भी देखा गया था। नियुक्तियों से पहले प्रकाशित रिपोर्टों में पार्टी के सामने क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण साधने को भी एक अहम चुनौती बताया गया था।
सवर्ण और SC-ST नेताओं में भी अंदरखाने नाराजगी?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि देवास भाजपा में ऐसे कई वरिष्ठ और सक्रिय कार्यकर्ता भी एल्डरमैन बनने की उम्मीद लगाए बैठे थे, जिन्हें इस बार मौका नहीं मिला। अब जातिगत प्रतिनिधित्व का मुद्दा सामने आने के बाद सवर्ण तथा SC-ST वर्ग से जुड़े कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं में भी अंदरखाने नाराजगी की चर्चा तेज हो सकती है।
हालांकि अभी तक भाजपा की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है कि एल्डरमैन चयन में सामाजिक या जातिगत प्रतिनिधित्व को लेकर क्या मापदंड अपनाए गए। यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर सभी आठ एल्डरमैन के OBC वर्ग से होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन Dewas Live स्वतंत्र रूप से सभी नियुक्त सदस्यों की आधिकारिक जाति-श्रेणी की पुष्टि नहीं करता है।
क्या भाजपा को देना होगा जवाब?
अब सवाल भाजपा संगठन और स्थानीय नेतृत्व के सामने है। यदि सोशल मीडिया पर किया जा रहा दावा सही है, तो क्या आठ पदों में से किसी एक पद पर भी सवर्ण, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग के कार्यकर्ता को अवसर नहीं दिया जा सकता था? क्या पार्टी ने नियुक्तियों में सामाजिक प्रतिनिधित्व का कोई फार्मूला अपनाया था, या फिर नाम पूरी तरह राजनीतिक सिफारिश और संगठनात्मक समीकरण के आधार पर तय किए गए?
देवास की राजनीति में एल्डरमैन नियुक्तियों का मामला फिलहाल थमता दिखाई नहीं दे रहा है। पहले नेताओं के खेमों के बीच पदों के बंटवारे की चर्चा और अब जातिगत प्रतिनिधित्व का सवाल—इन आठ नियुक्तियों ने भाजपा की अंदरूनी राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस मुद्दे को महज सोशल मीडिया की बहस मानकर छोड़ देती है या फिर पार्टी नेतृत्व की ओर से नियुक्तियों में सामाजिक संतुलन को लेकर कोई स्पष्टीकरण सामने आता है.

