
निगमायुक्त दलीप कुमार ने निर्माण तोड़ने और एफआईआर के दिए निर्देश; सवाल—निर्माण के समय आंखें बंद रखने वाले अधिकारियों पर कब होगी कार्रवाई?
देवास। नगर निगम की बैठकों में अवैध कॉलोनियों और अवैध निर्माणों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के आदेश पहले भी कई बार दिए जा चुके हैं। अधिकारी बदलते रहे, बैठकों में निर्देश जारी होते रहे, लेकिन शहर में अवैध निर्माण नहीं रुके। अब नए निगमायुक्त दलीप कुमार ने स्पष्ट कहा है कि अवैध कॉलोनी में किसी भी प्रकार का नया निर्माण नहीं होना चाहिए। यदि निर्माण किया जाता है तो उसे तत्काल तोड़ा जाए और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई जाए। आदेश सख्त है, लेकिन असली सवाल यही है कि क्या नगर निगम का अमला इसे जमीन पर लागू कर पाएगा?
निगमायुक्त ने सोमवार, 10 अगस्त को निगम बैठक हॉल में समयावधि पत्रों और सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों की समीक्षा की। बैठक में उन्होंने उपयंत्रियों को निर्देश दिए कि अवैध कॉलोनियों में चल रहे निर्माणों पर तत्काल कार्रवाई की जाए। हालांकि, देवास में बड़ी संख्या में ऐसी कॉलोनियां और निर्माण मौजूद हैं, जिन पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। कई स्थानों पर बिना अनुमति मकान बनते रहे, लेकिन निर्माण के शुरुआती चरण में कार्रवाई नहीं हुई। भवन तैयार हो जाने के बाद नोटिस जारी करने की औपचारिकता जरूर दिखाई देती है।
शहर में यह चर्चा भी आम रहती है कि अवैध निर्माणों पर कार्रवाई के नाम पर नोटिस तो दिए जाते हैं, लेकिन इसके बाद कई मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। कुछ मामलों में लेन-देन के आरोप भी लगते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच के बिना इन्हें तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन नगर निगम की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी ऐसे आरोपों को लगातार जन्म देती है।
सवाल यह भी है कि जब कोई अवैध मकान बनना शुरू होता है, तब संबंधित वार्ड का उपयंत्री, भवन निरीक्षक और स्वच्छता निरीक्षक कहां होते हैं? निर्माण एक दिन में पूरा नहीं होता। यदि निगम का मैदानी अमला नियमित निरीक्षण करता है तो अवैध निर्माण शुरुआती स्तर पर ही क्यों नहीं रोका जाता? मकान पूरा होने के बाद केवल भवन मालिक को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। निर्माण के दौरान लापरवाही बरतने या संरक्षण देने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
निगमायुक्त दलीप कुमार भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। ऐसे में उनसे यह उम्मीद की जा रही है कि अवैध कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई केवल बैठक और प्रेस नोट तक सीमित नहीं रहेगी। यदि निगम वास्तव में गंभीर है तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए कि शहर में कितनी अवैध कॉलोनियां हैं, कितने निर्माण वर्तमान में चल रहे हैं, कितनों को नोटिस दिया गया, कितने निर्माण हटाए गए और कितने मामलों में एफआईआर दर्ज कराई गई। हर कार्रवाई की वार्डवार जानकारी नगर निगम की वेबसाइट पर डालने से व्यवस्था में पारदर्शिता आ सकती है।
अवैध कॉलोनी में मकान बनाने वाले लोगों पर कार्रवाई के साथ उन कॉलोनाइजरों पर भी शिकंजा कसना जरूरी है, जिन्होंने बिना अनुमति जमीन के टुकड़े बेचकर लोगों को मुश्किल में डाला। यदि कार्रवाई केवल गरीब या मध्यमवर्गीय मकान मालिकों तक सीमित रहती है और कॉलोनाइजर तथा जिम्मेदार अधिकारी बच जाते हैं, तो इसे निष्पक्ष कार्रवाई नहीं कहा जा सकता।
बैठक में निगमायुक्त ने अवैध नल कनेक्शनों को वैध करने, सीवरेज कनेक्शन और अमृत 2.0 के नल कनेक्शनों की धीमी प्रगति पर भी नाराजगी जताई। संबंधित अधिकारियों और स्वच्छता निरीक्षकों को सूचना पत्र देने के निर्देश दिए गए। सड़क पर घूमने वाले आवारा मवेशियों को पकड़कर गौशाला नहीं छोड़ने वाले कर्मचारियों की सेवा समाप्त करने के निर्देश स्वास्थ्य अधिकारी को दिए गए।
इसके अलावा प्रधानमंत्री स्वनिधि, क्रेडिट कार्ड, संबल, कर्मकार कल्याण और मानधन योजना के आवेदनों में प्रगति लाने तथा ई-केवाईसी का काम तेज करने को कहा गया। मैरिज गार्डनों के संपत्तिकर खातों में सुधार, संपत्तिकर और कचरा संग्रहण शुल्क की वसूली, अमृत हरित अभियान के पौधों की जानकारी पोर्टल पर अपडेट करने, सड़क संकेतक और स्मार्ट फिश कॉर्नर का काम जल्द पूरा करने के निर्देश भी दिए गए। जर्जर भवनों को दिए गए नोटिस के बाद कार्रवाई करने और सीएम हेल्पलाइन की लंबित शिकायतों का एक सप्ताह में शत-प्रतिशत निराकरण करने को भी कहा गया है।
निगमायुक्त के निर्देश स्पष्ट और सख्त हैं, लेकिन उनकी असली परीक्षा क्रियान्वयन में होगी। यदि अगले कुछ दिनों में अवैध निर्माणों की सूची, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और की गई कार्रवाई सार्वजनिक होती है, तभी माना जाएगा कि नगर निगम की व्यवस्था में बदलाव शुरू हुआ है। अन्यथा यह आदेश भी निगम की पुरानी फाइलों और प्रेस नोटों में दर्ज होकर रह जाएगा।

